हज़रत हलीमा सादिया (रज़ि.) के घर बरकत का वाक़या

हज़रत मोहम्मद (सल्ल.) की पैदाइश से पहले ही उनके वालिद (पिता) हज़रत अब्दुल्लाह का इंतक़ाल हो चुका था। अरब के रिवाज के मुताबिक, बच्चों को सही अरबी ज़बान सीखने और देहात की साफ़-सुथरी हवा में परवरिश के लिए बदवी कबीलों में भेजा जाता था।

हलीमा सादिया की ग़रीबी: हज़रत हलीमा सादिया (रज़ि.) मक्के आईं ताकि किसी बच्चे को परवरिश के लिए ले सकें। वह बहुत ग़रीब थीं, उनकी ऊंटनी और बकरी दूध नहीं देती थी, और उनका अपना बच्चा भी भूख से रोता था। हुज़ूर (सल्ल.) को गोद लेना: यतीम होने की वजह से कोई और दाई आप (सल्ल.) को लेने के लिए तैयार नहीं थी। हज़रत हलीमा ने ख़ाली हाथ लौटने के बजाय आप (सल्ल.) को अपनी गोद में ले लिया।
बरकत का ज़हूर: जैसे ही उन्होंने हुज़ूर (सल्ल.) को गोद में लिया, उनकी ऊंटनी और बकरियां दूध से भर गईं। जिस कमज़ोर गधे पर वह सवार होकर आई थीं, वह वापसी में सबसे आगे चलने लगा। हज़रत हलीमा का घर बरकतों और ख़ुशहाली से भर गया।


शक-ए-सद्र (सीना चीरने) का वाक़या

जब आप (सल्ल.) लगभग 4-5 साल के थे और हज़रत हलीमा के पास देहात में बकरियां चरा रहे थे, तब यह वाक़या पेश आया:
फ़रिश्तों का आमद: हज़रत जिब्राइल (अलैहि सलाम) फ़रिश्ते के रूप में आए। दिल की पाकीज़गी: उन्होंने हुज़ूर (सल्ल.) का सीना मुबारक चाक (खोला) किया, उसमें से दिल निकाला और उसमें से शैतानी असर या काले धब्बे वाले हिस्से को अलग कर ज़मज़म के पानी से धोया गया। नबूवत की तैयारी: इसके बाद दिल को दोबारा उसकी जगह रखकर सीने को बंद कर दिया गया। जब साथ में खेल रहे बच्चों ने हज़रत हलीमा को यह बताया, तो वह घबरा गईं और सुरक्षा के लिहाज़ से आप (सल्ल.) को उनकी वालिदा हज़रत आमिना के पास मक्का वापस छोड़ आईं।


बचपन के अन्य अहम मोड़

6 साल की उम्र: वालिदा हज़रत आमिना का इंतक़ाल हो गया। इसके बाद दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने आपकी परवरिश की। 8 साल की उम्र: दादा के इंतक़ाल के बाद आपके चाचा हज़रत अबू तालिब ने आपको अपने साए में लिया और बहुत मोहब्बत से परवरिश की।

आप (सल्ल.) का नसब (खानदान):


हज़रत मोहम्मद (सल्ल.) का ताल्लुक़ अरब के सबसे इज़्ज़तदार कबीले **क़ुरैश** के **बनू हाशिम** घराने से था। आपका नसब-नामा हज़रत इब्राहीम (अलैहि सलाम) और हज़रत इस्माईल (अलैहि सलाम) से जाकर मिलता है। वालिद (पिता):हज़रत अब्दुल्लाह वालिदा (माता): हज़रत आमिना दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब (जो मक्का और काबा के निगहबान व सरदार थे) यतीमी और पैदाइश:
आप (सल्ल.) की पैदाइश से कुछ महीने पहले ही आपके वालिद हज़रत अब्दुल्लाह का व्यापारिक सफ़र से लौटते वक्त मदीना (उस समय 'यसरिब') में इंतक़ाल हो गया था। इस तरह आप दुनिया में आमद से पहले ही यतीम हो चुके थे। आप (सल्ल.) की पैदाइश **रबी-उल-अव्वल** के महीने में (आम-उल-फील यानी 'हाथियों वाले साल') मक्का मुअज़्ज़मा में हुई। आपकी पैदाइश के वक्त दुनिया में कई मोजिज़े (चमत्कार) देखने को मिले, जैसे फ़ारस (पारस) के आतिशकडे का बुझ जाना और शाम के महलों में नूर का फैल जाना। दादा अब्दुल मुत्तलिब ने आपका नाम **'मोहम्मद'** (जिसकी बहुत तारीफ़ की गई हो) रखा, जो अरब में उस वक्त एक नया नाम था।

देहात में परवरिश और हज़रत हलीमा सादिया का वाक़या

अरब के सरदारों में यह रिवाज था कि वे अपने नवजात बच्चों को शुद्ध अरबी भाषा (फ़साहत व बलाग़त) सीखने और देहात की साफ़-सुथरी आबोहवा में सेहतमंद परवरिश के लिए बदवी (देहाती) कबीलों में भेज देते थे। ### हज़रत हलीमा के घर बरकत: बनू साद कबीले की दाई **हज़रत हलीमा सादिया (रज़ि.)** मक्का आईं। वह बहुत ग़रीब थीं और उनकी सवारी भी बहुत कमज़ोर थी। यतीम बच्चा समझकर किसी और दाई ने हुज़ूर (सल्ल.) को नहीं लिया, लेकिन हज़रत हलीमा ख़ाली हाथ लौटने के बजाय आप (सल्ल.) को अपनी गोद में ले आईं। * जैसे ही उन्होंने आप (सल्ल.) को अपनी आगोश में लिया, उनकी सूखी छातियों और बकरियों के थनों में दूध भर आया। * उनकी कमज़ोर सवारी सबसे तेज़ चलने लगी। * उनके घर में हर तरफ बरकत और ख़ुशहाली छा गई। शक-ए-सद्र (सीना मुबारक चाक होना): जब आप (सल्ल.) लगभग 4-5 साल के थे और देहात में हज़रत हलीमा के बच्चों के साथ बकरियां चरा रहे थे, तब फ़रिश्ते हज़रत जिब्राइल (अलैहि सलाम) इंसानी रूप में आए। उन्होंने आप (सल्ल.) का सीना मुबारक चाक करके दिल निकाला और उसमें से एक काला धब्बा (शैतानी असर) निकालकर ज़मज़म के पानी से धोया, फिर दिल को वापस सीने में रखकर सीना ठीक कर दिया। इस वाक़ये से घबराकर हज़रत हलीमा ने आप (सल्ल.) को सुरक्षित उनकी वालिदा हज़रत आमिना के पास मक्का वापस पहुँचा दिया।

वालिदा और दादा का इंतक़ाल

* **6 साल की उम्र (वालिदा की वफ़ात):** जब आप (सल्ल.) छह साल के हुए, तो आपकी वालिदा हज़रत आमिना आपको अपने शोहर की क़ब्र की ज़ियारत और रिश्तेदारों से मिलने मदीना ले गईं। मदीना से वापसी के दौरान **'अबवा'** नाम के मक़ाम पर हज़रत आमिना बीमार हुईं और वहीं उनका इंतक़ाल हो गया। अब आप (सल्ल.) पूरी तरह यतीम हो चुके थे। * **दादा की कफ़ालत:** मक्का लौटने पर आपके दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने आपको सीने से लगाया और आपकी बेहद मसर्रत और प्यार से परवरिश की। काबा के साए में बिछी उनकी ख़ास नशिस्त (गद्दी) पर सिर्फ मोहम्मद (सल्ल.) को बैठने की इजाज़त थी। * **8 साल की उम्र (दादा की वफ़ात):** जब आपकी उम्र आठ साल आठ महीने हुई, तो आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब का भी इंतक़ाल हो गया। वफ़ात से पहले वे आप (सल्ल.) की ज़िम्मेदारी अपने बेटे (आपके सगे चाचा) **हज़रत अबू तालिब** को सौंप गए।

चाचा अबू तालिब का साया और शाम का सफ़र

हज़रत अबू तालिब बेहद ग़रीब थे और उनका परिवार बड़ा था, लेकिन उन्होंने अपने भतीजे मोहम्मद (सल्ल.) को अपने सगे बच्चों से भी ज़्यादा प्यार दिया। आप (सल्ल.) के उनके घर आने से उनके खाने और रिज़्क़ में भी बरकत होने लगी।

बुहैरा राहिब (पादरी) की भविष्यवाणी

जब आपकी उम्र लगभग 12 वर्ष थी, तब आपके चाचा अबू तालिब व्यापार के सिलसिले में शाम (Syria) का सफ़र करने लगे। आप (सल्ल.) की ज़िद और मोहब्बत को देखकर अबू तालिब आपको भी साथ ले गए। रास्ते में 'बसरा' नाम के मक़ाम पर एक ईसाई पादरी **बुहैरा** रहता था। उसने देखा कि एक बादल का टुकड़ा लगातार एक छोटे बच्चे (मोहम्मद सल्ल.) पर साया किए हुए है और दरख़्त की शाख़ें उनके ऊपर झुक रही हैं। बुहैरा ने आप (सल्ल.) को देखते ही पहचान लिया और आपकी पीठ पर **'मोहरे-नबूवत'** (नबूवत की मोहर) देखी। उसने अबू तालिब से कहा: *"यह तमाम जहानों के सरदार बनने वाले हैं। इन्हें शाम आगे न ले जाएं, यहूदियों से इनकी जान को ख़तरा है।"* इसके बाद अबू तालिब ने अपना माल वहीं बेच दिया और आप (सल्ल.) को मक्का वापस ले आए। जंगे-फ़िजार और हिल्फ़ुल-फ़ुज़ूल (समाज सेवा का अहद)

जंगे-फ़िजार:

जब आप (सल्ल.) लगभग 15-20 साल के थे, तब अरब के कबीलों (क़ुरैश और क़ैस) के बीच एक ख़ूनी जंग छिड़ गई, जिसे 'जंगे-फ़िजार' कहा जाता है (क्योंकि यह हुरमत वाले महीनों में लड़ी गई थी)। इस जंग में आप (सल्ल.) ने किसी पर हथियार नहीं उठाया, बल्कि सिर्फ अपने चाचाओं को दुश्मन के तीर उठाकर पकड़ाते थे। हिल्फ़ुल-फ़ुज़ूल (शान्ति समझौता): जंग के तबाही भरे मंज़र को देखकर मक्का के कुछ नेकी-पसंद लोगों ने **अब्दुल्लाह बिन जुदआन** के मकान पर एक ऐतिहासिक मुआहिदा (समझौता) किया। इसका मक़सद था: 1. मक्का में किसी मक़ामी या बाहरी शख़्स पर ज़ुल्म नहीं होने दिया जाएगा। 2. मज़रूम (पीड़ित) की मदद की जाएगी, चाहे वह किसी भी कबीले का हो। 3. ज़ालिम से उसका हक़ छीना जाएगा। हज़रत मोहम्मद (सल्ल.) इस समझौते में शामिल थे और नबूवत के बाद भी आप (सल्ल.) फरमाते थे कि *"मुझे इस समझौते के बदले लाल ऊंट भी दिए जाते तो मैं न लेता, और आज इस्लाम में भी अगर कोई मुझे ऐसे समझौते के लिए बुलाए तो मैं लब्बैक कहूँगा।"* अल-अमीन और अल-सादिक़ का ख़िताब अपनी जवानी के दौर में आप (सल्ल.) ने कभी भी अरब की बुराइयों—शराबनोशी, जुआ, बुतपरस्ती (मूर्तियों की पूजा), या बेहयाई—में हिस्सा नहीं लिया। * आपका अख़लाक़, सच्चाई, ईमानदारी और पाकीज़गी पूरे मक्का में मशहूर हो गई। * लोग आपके पास अपनी अमानतें (क़ीमती सामान) हिफ़ाज़त के लिए रखते थे। * मक्का के लोग आपको **'अल-सादिक़'** (सच्चा) और 'अल-अमीन' (अमानतदार/ईमानदार) कहकर पुकारते थे।

हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) से निकाह

हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) मक्का की एक बेहद शरीफ़, मालदार और इज़्ज़तदार बेवा (विधवा) ताज़िर ख़ातून थीं, जिन्हें लोग **'ताहिरा'** (पाकीज़ा) कहते थे। जब उन्होंने हज़रत मोहम्मद (सल्ल.) की अमानत और सच्चाई के चर्चे सुने, तो उन्होंने आप (सल्ल.) के सामने अपना व्यापारिक माल शाम ले जाने की पेशकश की और मुनाफे में दूसरों से दोगुना हिस्सा देने का वादा किया। आप (सल्ल.) हज़रत ख़दीजा के गुलाम **मैसरा** के साथ शाम के व्यापारिक सफ़र पर गए। इस सफ़र में आपकी ईमानदारी की वजह से ग़ैर-मामूली मुनाफ़ा हुआ। मैसरा ने मक्का लौटकर हज़रत ख़दीजा को आप (सल्ल.) के बुलंद अख़लाक़, ईमानदारी और सफ़र के दौरान आपके ऊपर बादल के साया करने जैसे मुअजिज़ात बताए।

निकाह का पैग़ाम:

हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) आप (सल्ल.) के चरित्र से इस क़दर प्रभावित हुईं कि उन्होंने अपनी सहेली नफीसा के ज़रिए आप (सल्ल.) को निकाह का पैग़ाम भेजा। * उस वक्त **हज़रत मोहम्मद (सल्ल.) की उम्र 25 वर्ष** थी और **हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) की उम्र 40 वर्ष** थी। * आप (सल्ल.) ने अपने चाचाओं से मशविरा करके इस पैग़ाम को मंज़ूर किया। हज़रत अबू तालिब ने निकाह का ख़ुत्बा पढ़ा और यह मुबारक निकाह संपन्न हुआ। * हज़रत ख़दीजा से ही आप (सल्ल.) की लगभग तमाम औलादें (हज़रत क़ासिम, हज़रत अब्दुल्लाह, हज़रत ज़ैनब, हज़रत रुकैया, हज़रत उम्मे कुलसूम, और हज़रत फ़ातिमा) हुईं।

काबा की तामीर और हजरे-अस्वद का फ़ैसला

जब आप (सल्ल.) की उम्र लगभग 35 वर्ष हुई, तो एक ज़बरदस्त सैलाब (बाढ़) के कारण काबा की इमारत को भारी नुक़सान पहुँचा। क़ुरैश ने मिलकर काबा की नए सिरे से तामीर (पुनर्निर्माण) करने का फ़ैसला किया। विवाद और ख़ून-ख़राबे की नौबत: काबा की दीवारें बनकर तैयार हो गईं, लेकिन जब **'हजरे-अस्वद'** (जन्नत के काले पत्थर) को उसकी जगह पर लगाने की बारी आई, तो कबीलों में झगड़ा हो गया। हर कबीले का सरदार चाहता था कि यह सआदत (सौभाग्य) सिर्फ उसे मिले। बात इतनी बढ़ गई कि तलवारें खिंच गईं और जंग की नौबत आ गई।

हिकमत भरा फ़ैसला:

कबीले के एक बुज़ुर्ग अम्र बिन मुग़ीरा ने मशविरा दिया कि *"कल सुबह सबसे पहले जो शख़्स काबा के सहन में दाख़िल होगा, वही इसका फ़ैसला करेगा।"* अगली सुबह जब लोगों ने देखा कि सबसे पहले दाख़िल होने वाले शख़्स **हज़रत मोहम्मद (सल्ल.)** हैं, तो सब ख़ुशी से चिल्ला उठे: **"यह अल-अमीन हैं! हम इनके फ़ैसले पर राज़ी हैं।"** आप (सल्ल.) ने अपनी अक़्लमंदी और हिकमत से एक चादर मंगवाई, हजरे-अस्वद को उस चादर पर रखा और तमाम कबीलों के सरदारों से कहा कि वे चादर के कोनों को पकड़कर ऊपर उठाएं। जब पत्थर दीवार के पास पहुँच गया, तो आप (सल्ल.) ने अपने मुबारक हाथों से उसे उठाकर उसकी जगह नसब (स्थापित) कर दिया। इस तरह आपने एक बहुत बड़े ख़ून-ख़राबे को टाल दिया।

ख़ल्वत-नशीनी और ग़ारे-हिए की तन्हाई

जैसे-जैसे आप (सल्ल.) की उम्र 40 साल के क़रीब पहुँचने लगी, आपका दिल दुनियावी चहल-पहल से दूर होने लगा। आप मक्का के समाज में फैले शिर्क, बुतपरस्ती, ज़ुल्म और बुराइयों से बेहद दुखी रहते थे और इंसानी तक़दीर व उसके पैदा करने वाले के बारे में सोचते थे। ग़ारे-हिरा (हिरा की गुफ़ा):आप (सल्ल.) मक्का से लगभग 3 मील दूर **'जबल-ए-नूर'** पहाड़ पर मौजूद **ग़ारे-हिरा** में जाकर तन्हाई में इबादत करने लगे। आप अपने साथ सत्तू और पानी ले जाते और कई-कई दिनों तक अल्लाह की इबादत और ज़िक्र में मश्गूल रहते।

नबूवत का ज़हूर (पहली वही की आमद)

जब आप (सल्ल.) की उम्र **40 वर्ष** हुई (रमज़ान का महीना), तब नबूवत का सूरज चमका। पहली वही (Wahi) एक दिन आप (सल्ल.) ग़ारे-हिरा में मौजूद थे कि फ़रिश्ते हज़रत जिब्राइल (अलैहि सलाम) अल्लाह के हुक्म से तशरीफ़ लाए और आपसे कहा: **"इक़रा" (पढ़ो!)** आप (सल्ल.) ने फरमाया: *"मैं पढ़ना नहीं जानता।"* हज़रत जिब्राइल ने आप (सल्ल.) को भींचा (भींचकर सीने से लगाया) और फिर छोड़ा, और कहा: *"पढ़ो!"* आप (सल्ल.) ने फिर वही जवाब दिया। जिब्राइल (अलैहि सलाम) ने तीसरी बार आपको भींचा और फिर **सूरह अल-अलक़** की शुरुआती 5 आयतें नाज़िल कीं:

पढ़ो अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया।

जिसने इंसान को जमे हुए ख़ून के लोथड़े से बनाया। पढ़ो! और तुम्हारा रब बड़ा करीम है, जिसने क़लम के ज़रिए इल्म सिखाया, इंसान को वह सिखाया जो वह नहीं जानता था।"** (सूरह अल-अलक़: 1-5)* यह अल्लाह का पहला पैग़ाम था जो नबूवत की शकल में हज़रत मोहम्मद (सल्ल.) पर नाज़िल हुआ।

हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) की तसल्ली और वरक़ा बिन नौफ़ल:

इस अचानक घटे वाक़ये और जिब्राइल (अलैहि सलाम) के हैबतदार रूप को देखकर आप (सल्ल.) का दिल कांप रहा था। आप घर पहुँचे और हज़रत ख़दीजा से फरमाया: *"मुझे कम्बल ओढ़ा दो, मुझे कम्बल ओढ़ा दो!"* जब आपकी घबराहट कम हुई, तो आपने हज़रत ख़दीजा को पूरा वाक़या सुनाया। इस पर हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) ने इतिहास के ऐतिहासिक शब्द कहे:

हरगिज़ नहीं! अल्लाह की क़सम, अल्लाह आपको कभी रुसवा नहीं करेगा।

आप रिश्तेदारों के साथ अच्छा सुलूक करते हैं, बेसहारा लोगों का बोझ उठाते हैं, महरूमो को कमा कर देते हैं, मेहमानी करते हैं और हक़ के कामों में मदद करते हैं।"* इसके बाद हज़रत ख़दीजा आप (सल्ल.) को अपने चचेरे भाई **वरक़ा बिन नौफ़ल** के पास ले गईं, जो इब्रानी भाषा और इंजील (बाइबल) के बड़े आलिम थे। पूरा वाक़या सुनने के बाद वरक़ा बिन नौफ़ल ने कहा: "यह वही 'नामूस' (फ़रिश्ता जिब्राइल) है जो हज़रत मूसा (अलैहि सलाम) पर नाज़िल हुआ था। काश! मैं उस वक्त ज़िंदा रहूँ जब आपकी क़ौम आपको इस शहर से निकाल देगी।"* आप (सल्ल.) ने हैरत से पूछा: *"क्या मेरी क़ौम मुझे निकाल देगी?"* वरक़ा ने जवाब दिया: *"हाँ, जब भी कोई इंसान वह पैग़ाम लाया है जो आप लाए हैं, तो पूरी दुनिया उसकी दुश्मन बन गई।"*

निष्कर्ष (नबूवत का आगाज़)

ग़ारे-हिरा में इस पहली वही के साथ ही हज़रत मोहम्मद (सल्ल.) के बचपन और जवानी का दौर मुकम्मल हुआ और यहाँ से आपके **'रसूल' (अल्लाह के पैग़ामबर)** और **'नबी'** के रूप में 23 साल के उस महान क्रांतिकारी सफ़र की शुरुआत हुई, जिसने पूरी दुनिया के इतिहास को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया।

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